और की रचना शिरकत कर रही है | इसका नाम है फिर :फिर... आज सुबह बादल न थे आसमान में,
फिर भी बारिश की मुझे उम्मीद थी ,
वक्त भी ठहरा नहीं ... गुज़र रहा था ,
और... सूरज भी मुझे मानो चिढा रहा था ,
साढ़े तीन बजे तक आग से जद्दोजहद मेरी चलती रही ,
और साथ ही उम्मीद भी मेरी कम होती रही ,
चार बजे तक यकीनन उम्मीद दम तोड़ ही देती...
फिर... कुछ देर बाद राहत ने दस्तक दी ,
और वो आफ्ताब जो अब तक मुझे जला रहा था , चिढा रहा था ,
को अब्र मानो निगल ही गए थे ,
फिर मुझे एक एहसास हुआ ,
जो मेरे होंठो पर एक हल्की सी मुस्कान छोड़ गया,
"खुदा के घर देर है, अंधेर नहीं "
अखिल जे. एस. भारद्वाज
2 comments:
wah wah... kya baat hai... padhkar ek nayi taazgi ka ehsaas hua bus sadhe teen wali line k baad umeed meri kum hoti rahi hai tabhi upar wali line ka matlab dhang se niklega... baaki suba\hanallah.. aisa laga jaise bhatakti kashti ko kinara mil gaya :)
भाई मुआफी चाहता हू तेरा नाम लिखना भूल गया था |
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