Thursday, July 7, 2011

एक हबीब की ख्वाहिश

आज एक बहुत ही अच्छा एहसास हुआ | एक दोस्त, जो अमूमन मुझे बात नहीं कर पाता, ने मुझे दफ्तर में फोन किया | किसी काम से नहीं, उसने एक कविता लिखी थी और वो मुझे सुनना चाहता था | मैंने सुना और कही न कही गुलज़ार साब के अंदाज़ को पाया | वो कविता मैं आज अपने दीवान में लिख रहा हू | जी हाँ पहली बार मेरे दीवान में किसी और की रचना शिरकत कर रही है | इसका नाम है फिर :


फिर... आज सुबह बादल न थे आसमान में,

फिर भी बारिश की मुझे उम्मीद थी ,

वक्त भी ठहरा नहीं ... गुज़र रहा था ,

और... सूरज भी मुझे मानो चिढा रहा था ,

साढ़े तीन बजे तक आग से जद्दोजहद मेरी चलती रही ,

और साथ ही उम्मीद भी मेरी कम होती रही ,

चार बजे तक यकीनन उम्मीद दम तोड़ ही देती...

फिर... कुछ देर बाद राहत ने दस्तक दी ,

और वो आफ्ताब जो अब तक मुझे जला रहा था , चिढा रहा था ,

को अब्र मानो निगल ही गए थे ,

फिर मुझे एक एहसास हुआ ,

जो मेरे होंठो पर एक हल्की सी मुस्कान छोड़ गया,

"खुदा के घर देर है, अंधेर नहीं "

अखिल  जे.  एस. भारद्वाज

2 comments:

akhil js bhardwaj said...

wah wah... kya baat hai... padhkar ek nayi taazgi ka ehsaas hua bus sadhe teen wali line k baad umeed meri kum hoti rahi hai tabhi upar wali line ka matlab dhang se niklega... baaki suba\hanallah.. aisa laga jaise bhatakti kashti ko kinara mil gaya :)

Paritosh said...

भाई मुआफी चाहता हू तेरा नाम लिखना भूल गया था |